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काॅलेज प्रोफेसर डाॅ.दीप्ति ने बनाया हिंदी-इंग्लिश की टूटी-फूटी चैटिंग लैंग्वेज से Gen-Z के सेंटीमेंट्स जानने का अनोखा सॉफ्टवेयर

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सुरक्षित इंटरनेट दिवस विशेष : कोरबा के पंडित रविशंकर शुक्ल नगर निवासी डाॅ दीप्ति सिंह क्षत्रिय ने अपने शोध कार्य के अंतर्गत कोरबा, सरगुजा, जांजगीर-चाम्पा, बिलासपुर और रायपुर समेत छत्तीसगढ़ के 17 काॅलेज और 1250 स्टूडेंट्स से फीडबैक लिया गया। पहले उनका माॅडल प्योर इंग्लिश लैंग्वेज में सेंटिमेंट एनाॅलिसिस करना था, पर ज्यादातर स्टूडेंट न तो इंग्लिश और न ही हिंदी लैंग्वेज में फीडबैक के लिए खुद को सहज महसूस कर रहे थे। ऐसे में उन्होंने हिंग्लिश लैंग्वेज चयन करने का निर्णय लिया और यह निष्कर्ष ढूंढ़ निकाला।

पूर्व में कमला नेहरु महाविद्यालय कोरबा में कंप्यूटर साइंस की सहायक प्राध्यापक रहीं दीप्ति वर्तमान में बलौदाबाजार जिले के डीके काॅलेज में कार्यरत हैं।


कोरबा। आज की जेनरेशन, यानी जिन्हें अब जेन-जी (Gen Z) कहा जाता है, उनकी फास्ट लाइफ में इतनी भी फुरसत नहीं, कि सोशल मीडिया की चेटिंग का जवाब पूरे शब्दों में दे सकें। जल्दी से जल्दी मैसेजिंग और वक्त बचाने की होड़ के बीच ही सही, अनजाने में हमारे भारतीय युवाओं ने एक नई डिजिटल लैंग्वेज तक ईजाद कर डाला, जिसे हम हिंग्लिश कहते हैं। हिंदी और अंग्रेजी के मिश्रण से अस्तित्व में आई इसी टूटी-फूटी चैटिंग लैंग्वेज पर फोकस एक रिसर्च की गई। काॅलेज प्रोफेसर डाॅ. दीप्ति सिंह क्षत्रिय ने अपनी इस रिसर्च के जरिए एक ऐसा साॅफ्टेवयर टेक्नीक तैयार किया, जिससे काॅलेज-यूनिवर्सिटी की शिक्षा प्राप्त रहे युवाओं द्वारा यूज की जाने वाली हिंग्लिश फीडबैक से उनके सेंटिमेंट्स का पता लगाया जा सकता है।

मूलतः कोरबा के पंडित रविशंकर शुक्ल नगर निवासी डाॅ दीप्ति सिंह क्षत्रिय ने सेंटिमेंट एनाॅलिसिस यूजिंग मशीन लर्निंग के अपने शोध कार्य के अंतर्गत छत्तीसगढ़ के 17 काॅलेज और 1250 स्टूडेंट्स से फीडबैक लिया गया। इनमें कोरबा, सरगुजा, जांजगीर-चाम्पा, बिलासपुर और रायपुर जिले के काॅलेज शामिल हैं। डेवलपमेंट आफ अ माॅडल फाॅर सेंटिमेंट एनाॅलिसिस यूजिंग मशीन लर्निंग टू इम्प्रूव लर्निंग एप्टिट्यूट एड पोस्ट ग्रेज्युएशन लेवल के टाॅपिक पर इस शोध कार्य को पूरा करने मैट्स यूनिवर्सिटी रायपुर में स्कूल आफ इंफाॅर्मेशन टेक्नोलाॅजी के विभाग प्रमुख प्रोफेसर डाॅ ओमप्रकाश चंद्राकर ने डाॅ दीप्ति के गाइड की भूमिका निभाई। डाॅ दीप्ति पूर्व अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद नेता स्व. अमित सिंह चंदेल की पत्नी हैं। उन्होंने अपनी इस सफलता का श्रेय माता मांडवी सिंह, पिता प्रेम सिंह, ससुरजी यशवंत सिंह और अपनी पुत्री अद्विका सिंह चंदेल को दिया है, जिनके सहयोग एवं आशीर्वाद से वह अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकीं। पूर्व में कमला नेहरु महाविद्यालय कोरबा में कंप्यूटर साइंस की सहायक प्राध्यापक रहीं दीप्ति वर्तमान में बलौदाबाजार जिले के डीके काॅलेज में कार्यरत हैं।


उच्च शिक्षण संस्थाओं की व्यवस्था बेहतर करने में सहायक

डाॅ दीप्ति सिंह ने बताया कि उनके द्वारा ईजाद की गई इस नई विधि से अंडर ग्रेज्युएट या पीजी के स्टूडेंट्स के सेंटिमेंट की एनालिसिस कर उनके इंस्टीट्यूशंस के अध्ययन-अध्यापन से जुड़ी सुविधा व संसाधनों का आंकलन करना किया जा सकता है। इस एनाॅलिसिस उस संस्था के प्रति फीड बैक पाॅजिटिव वे में है या निगेटिव, यह जान सकते हैं। नतीजों की मदद से उनके संस्थाओं की व्यवस्था दुरुस्त या बेहतर करने की दिशा में व्यापक पहल की जा सकती है। पहले उनका माॅडल प्योर इंग्लिश लैंग्वेज में सेंटिमेंट एनाॅलिसिस करना था पर ज्यादातर स्टूडेंट न तो इंग्लिश और न ही हिंदी लैंग्वेज में फीडबैक के लिए खुद को सहज महसूस कर रहे थे। ऐसे में उन्होंने हिंग्लिश लैंग्वेज चयन करने का निर्णय लिया और यह निष्कर्ष ढूंढ़ निकाला।


इस साॅफ्टेवयर टेक्नीक में 92 प्रतिशत एक्यूरेसी

लैग्जिकन विथ सपोर्ट वैक्टर मशीन का उपयोग कर डाॅ दीप्ति की सेंटिमेंट एनाॅलिसिस में उन्होंने अपनी इस साॅफ्टेवयर टेक्नीक में 92 प्रतिशत एक्यूरेसी हासिल कर यह सफलता पाई है। रिसर्च के पूर्व की स्थिति में नाॅर्मल हिंदी या अंग्रेजी लैंग्वेज के फीडबैक को एनाॅलिसिस करने का विकल्प तो मौजूद था, पर हिंग्लिश लैंग्वेज के लिए यह पहली बार है जो इस लैंग्वेज के फीडबैक को एनालिसिस करने का साफ्टवेयर टूल तैयार किया गया। रिसर्च के दौरान डिफ्रेंट मशीन लर्निंग व डीप लर्निंग टेक्नीक का उपयोग किया गया और लैग्जिकन विथ सपोर्ट वैक्टर मशीन को हाई एक्यूरेसी में सर्वश्रेष्ठ पाया गया।

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