कलेक्टर कुणाल दुदावत (IAS) ने की छात्रा की माता को मानदेय भृत्य के पद पर पदस्थ करने की मानवीय पहल, 10वीं बोर्ड में 73 प्रतिशत अंक, शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय बलगीखार में 11वीं जीवविज्ञान में पढ़ रही 80 प्रतिशत दिव्यांग संगीता, डॉक्टर बनने का संकल्प।
कोरबा। कहते हैं कि यदि हौसले बुलंद हों तो शारीरिक सीमाएँ भी मंज़िल का रास्ता नहीं रोक सकतीं। इस कहावत को सच कर दिखा रही है संगीता, जो 80 प्रतिशत दिव्यांग होने के बावजूद अपने जीवन का लक्ष्य डॉक्टर बनकर समाज और जरूरतमंद लोगों की सेवा करना मानती है। लाडली के साथ उसकी माता का यह तप कक्षा पहली से शुरू हुआ, जो आज भी जारी है। वर्तमान में संगीता बलगीखार शासकीय स्कूल में 11वीं जीवविज्ञान की छात्रा है।
संगीता ने कठिन परिस्थितियों के बीच अपनी मेहनत और लगन से कक्षा 10वीं की बोर्ड परीक्षा 73 प्रतिशत अंकों के साथ उत्तीर्ण की। वर्तमान में वह शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय बलगीखार, विकासखंड कटघोरा, जिला कोरबा में जीवविज्ञान संकाय की छात्रा है और डॉक्टर बनने के अपने सपने को साकार करने के लिए पूरी निष्ठा से अध्ययन कर रही है।
संगीता की सफलता के पीछे उसकी मां श्रीमती दिलबाई कंवर का अथाह त्याग और समर्पण है। 80 प्रतिशत दिव्यांग होने के कारण संगीता स्वयं विद्यालय आने-जाने में सक्षम नहीं है। ऐसे में उसकी मां प्रतिदिन उसे अपनी गोद में उठाकर विद्यालय लाती और वापस घर ले जाती रही हैं। मां का यह त्याग केवल एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि अपनी बेटी के सपनों को पंख देने का अद्भुत उदाहरण है।
संगीता के चेहरे पर कभी निराशा दिखाई नहीं देती। न किसी से कोई शिकायत, न कोई शिकवा। वह शांत मन, दृढ़ संकल्प और सकारात्मक सोच के साथ अपने अध्ययन में निरंतर लगी रहती है। उसकी यही दृढ़ इच्छाशक्ति हर विद्यार्थी के लिए प्रेरणा है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि लक्ष्य स्पष्ट हो तो सफलता अवश्य मिलती है।
संगीता की परिस्थितियों को देखते हुए विद्यालय के व्याख्याता संजय राठौर ने उसकी शिक्षा में आने वाली कठिनाइयों से अवगत कराते हुए माननीय कलेक्टर, जिला कोरबा से मानवीय आधार पर सहयोग का निवेदन किया। इस संवेदनशील आग्रह को गंभीरता से लेते हुए कोरबा कलेक्टर कुणाल दुदावत (आईएएस) ने अत्यंत मानवीय दृष्टिकोण अपनाया और संगीता की माता श्रीमती दिलबाई कंवर को विद्यालय में मानदेय भृत्य के पद पर पदस्थ करने की पहल की, जिससे वे विद्यालय समय में अपनी बेटी के साथ रहकर उसकी आवश्यकताओं की देखभाल कर सकें।
यह निर्णय केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि संवेदनशील शासन, समावेशी शिक्षा और मानवीय मूल्यों का उत्कृष्ट उदाहरण है। इससे न केवल संगीता की शिक्षा का मार्ग और अधिक सुगम हुआ है, बल्कि यह संदेश भी गया है कि यदि प्रशासन, विद्यालय और समाज मिलकर किसी प्रतिभा का हाथ थाम लें, तो कोई भी सपना अधूरा नहीं रहता।
विद्यालय परिवार ने जताया जिलाधीश आभार
विद्यालय परिवार ने इस मानवीय निर्णय के लिए माननीय कलेक्टर, जिला कोरबा के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया है। साथ ही विश्वास व्यक्त किया है कि संगीता जैसी प्रतिभाशाली छात्रा एक दिन डॉक्टर बनकर समाज की सेवा करेगी और अपनी सफलता से यह सिद्ध करेगी कि हौसलों के सामने दिव्यांगता भी छोटी पड़ जाती है।
संगीता की कहानी केवल एक छात्रा की कहानी नहीं, बल्कि संघर्ष, मातृत्व, संवेदनशील प्रशासन और अटूट संकल्प की ऐसी प्रेरणादायक गाथा है, जो हर व्यक्ति को यह विश्वास दिलाती है कि सपनों की कोई सीमा नहीं होती।
सामाजिक संस्थाओं, उद्योगों से गुजारिश, संगीता को CSR से उपलब्ध हो विशेष ट्राइसाइकिल
संगीता की दैनिक यात्रा आज भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। इसलिए समाज, जनप्रतिनिधियों, उद्योगों की CSR इकाइयों तथा जिला प्रशासन से एक विनम्र अपील है कि संगीता को ऐसी विशेष ट्राइसाइकिल (डुअल सीट/केयरगिवर ट्राइसाइकिल) उपलब्ध कराई जाए, जिसमें मां और बेटी दोनों सुरक्षित रूप से बैठ सकें तथा मां स्वयं उसे विद्यालय ला-ले जा सके।
ऐसी ट्राइसाइकिल केवल एक साधन नहीं होगी, बल्कि एक बेटी के सपनों को गति देने वाला सहारा होगी। इससे मां के शारीरिक श्रम में कमी आएगी, संगीता नियमित रूप से विद्यालय पहुंच सकेगी और अपने डॉक्टर बनने के सपने को और अधिक आत्मविश्वास के साथ पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ सकेगी।






