आज की कथा में श्रोतागणों के नयन भक्ति और करुणा के अश्रुओं से भीगे…,
कोरबा। पितृमोक्षार्थ गयाश्राद्धांतर्गत मातनहेलिया परिवार द्वारा जश्न रिसोर्ट कोरबा में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन कथा वाचक पंडित विजय शंकर मेहता ने आज बड़े ही मार्मिक कथा सुनाई। आज की कथा में विरह थी, माता-पिता के साथ संतान का बिछुड़ना, कृष्ण के साथ गोपी-गोपियों का बिछुड़ना, नंदराय-यशोदा के साथ कृष्ण का बिछुड़ना था। भगवान श्रीकृष्ण वृंदावन छोड़कर मथुरा गमन कर गए और कंस का संहार कर 11 साल से कारागार में बंद अपने पिता वासुदेव और देवकी को छुड़ाना था। एक तरफ नंदराय-यशोदा के साथ विरह तो दूसरी ओर वासुदेव-देवकी के साथ मिलन की परमानुभूति थी।
इस कथा के पूर्व पंडित विजय शंकर मेहता ने भगवान कृष्ण की वह लीला सुनाई, जब कृष्ण 7 साल के थे। कृष्ण ने देखा पूरा ब्रजवासी हाथ में थाली सजाकर घर से निकल रहे थे। कृष्ण ने मां यशोदा से पूछा- मां सभी ब्रजवासी कहां जा रहे हैं। उत्तर मिला-मानसून का समय आ रहा है और हम अच्छी वर्षा के लिए इंद्र की पूजा करने जा रहे हैं। भगवान ने इंद्र की पूजा रूकवाई और गोवर्धन की पूजा की। इंद्र रूष्ट हो गए, सात दिन तक भयंकर वर्षा हुई, सात साल के बालक ने एक ऊंगली में गोवर्धन को उठाया और ब्रजवासियों की रक्षा की। इंद्र का घमंड चूर हुआ। इंद्र आए तो कृष्ण से पूछा-आपने ऐसा क्यों किया? कृष्ण ने कहा-तुम लोगों के लिए बारिश का माध्यम हो, इस उपकार के बदले खुद की पूजा कराना भ्रष्टाचार है। कृष्ण ने कहा- प्रकृति की पूजा करें, व्यक्ति की नहीं।
प्रकृति से प्रेम करें, एक-एक पेड़ का मान बढ़ाएं
जीवन प्रबंधन गुरू एवं कथा वाचक पंडित मेहता ने कहा कि जीवन तभी समृद्ध और खुशहाल होगा, जब प्रकृति आबाद रहेगी। एक-एक पेड़ का मान बढ़ाएं, नुकसान न पहुंचाएं, पानी की एक-एक बंूद बचाएं, स्वच्छता को कर्त्तव्य समझें। अन्न की रक्षा करें, तभी भूखे को भरपेट भोजन मिलेगा।
कृष्ण की रासलीला निष्काम थी
भगवान कृष्ण को कर्मयोगी कहा जाता है। कृष्ण की रासलीला पर कई प्रश्न खड़े करने वाले लोग मिल जाते हैं, लेकिन आध्यात्म की नजर से देखें। आपको निष्काम नजर आएगी। कृष्ण ने कभी सत्ता नहीं स्वीकारी और बड़े-बड़े कर्म कर कर्मयोगी बने और धर्म की स्थापना की।
पिता सृष्टि के निर्माण की अभिव्यक्ति हैं
ब्रज छोड़कर जब कृष्ण मथुरा गए और कंस का वध किया, तो यह समाचार नंदराय को भी मिला। नंदराय, कृष्ण के महल के बाहर खड़े थे, जब यह बात कृष्ण को पता चली, तो दौड़े-दौड़े पिता के चरणों में गिर पड़े। नंदराय की जिद्द पर कृष्ण बोले-मुझे इससे भी बड़ा लक्ष्य हासिल करना है, मुझे ब्रज जाने के लिए जिद्द न करें। इस प्रसंग को सुनाते हुए पंडित मेहता ने कहा- जब खाली हाथ नंदराय ब्रज गए तो उनकी आंखों में आंसू की नदियां बह रही थी और यह दृश्य देखकर पूरा ब्रह्मांड भी रोया था। श्रोतागणों मां बच्चों के लिए मीठी पालनहार है, तो पिता सृष्ठि के निर्माण की अभिव्यक्ति है। पिता जीवन है, सम्बल है, पिता शक्ति है। जब पिता का साया उठ जाता है, तो लोग अनाथ हो जाते हैं, इसलिए जब तक माता-पिता हैं, उनका कहना मानो, उनकी सेवा करो, यही जीवन का यथार्थ है।
राजकुमार जी का शिक्षा प्रकल्प देखकर चकित हूं
समय निकालकर आज पंडित विजय शंकर मेहता मड़वारानी के पास खरहरकुड़ा स्थित नितेश कुमार मेमोरियल लायंस पब्लिक स्कूल पहुंचे और वहां का निरीक्षण कर काफी प्रभावित हुए। कथा स्थल पर उन्होंने कहा-राजकुमार अग्रवाल जी का शिक्षा प्रकल्प देखकर चकित हूं। वहां गरीब और ग्रामीण बच्चों को शिक्षा देकर राजकुमार ने सबसे बड़ा काम का उदाहरण दिया है, यही धन का सच्चा सदुपयोग है। पंडित विजय शंकर मेहता ने करीब एक घंटा बच्चों को मोटीवेट किया और कहा- अभी जितनी मेहनत करोगे, आगे चलकर भविष्य उज्ज्वल बना सकोगे। 29 अगस्त को कथा वाचक द्वारा राजसूय यज्ञ, सुदामा चरित्र की कथा सुनाएंगे।
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