चुनाव-दर-चुनाव इनके सियासी करियर में दगा देने के कई खिताब, क्या भाजपा के शाह लगा पाएंगे हिसाब


कोरबा। शहरी विधानसभा की हाई प्रोफाइल सीट पर कमल खिलाने का सपना देख रही पार्टी ने जिसे अपना नेता चुना है, भगवा पार्टी के इस लाल की निष्ठा पर अनेक बार सवाल उठते रहे हैं। उनके सियासी करियर की किताब में अपनों को ही दगा देने के कई खिताब दर्ज हैं।यह सभी जानते हैं कि हर चुनाव में कोरबा के इस लाल ने अपनी ही पार्टी के प्रत्याशी के लिए गड्ढा खोदने का जैसे रिकार्ड ही बना रखा है। कुछ साल पीछे चलें तो  लोकसभा में ज्योतिनंद के आनंद को रुसवाई में बदलने भी इन्होंने बड़ी भूमिका निभाई। वे कोरबा विधानसभा से आगे रहे, बावजूद इसके उस वक्त कटघोरा की कमान संभाल रहे इस लाल ने जनता के बीच भाजपा की वकालत करने की बजाए ज्योतिनंद की खुलकर खिलाफत की, जिसका खामियाजा भाजपा को भुगतना पड़ा। भाजपा, कटघोरा से पिछड़ गई। कोरबा लोकसभा से भाजपा पीएम मोदी को एक सीट दे सकती थी। लेकिन आपसी अनबन के चलते खिलाफत करने वाले लाल के कारण यह संभव नहीं हुआ। इसी तरह विधानसभा चुनाव में भी लांबा और महतो का अलग-अलग गुट है। 2013 में जब लांबा को टिकट मिला था। तब भी इसी लाल ने इनके लिए भी गड्ढा खोदा। अपने समर्थकों से कह दिया कि लांबा को चुनाव में हराना है। तब भी उन्होंने विरोधियों से हाथ मिलाया और बिक गए। इसी तरह जब 2018 में विकास महतो को टिकट मिला तब भी भाजपा के इस लाल ने साथ नहीं दिया। संगठन को लेकर पूरे चुनाव से गायब रहे। कई इलाकों में गड्ढा खोदा। जिसका परिणाम यह हुआ कि विकास भी चुनाव हार गए। अब ऐसे प्रत्याशी को भाजपा ने मैदान में उतार दिया है।

पार्षद भाई भी बिके तो बना कोरबा में कांग्रेसी महापौर

यह बात सभी जानते हैं कि नगर पालिका निगम कोरबा में भाजपा पार्षदों की संख्या अधिक है। लेकिन फिर भी महापौर कांग्रेस का बन गया। कांग्रेस के महापौर ने केवल एक वोट से महापौर का चुनाव जीत लिया। निर्वाचित पार्षदों को ही महापौर के लिए मतदान का अधिकार मिला। इस लाल के भाई पार्षद हैं। तभी से यह सवाल कायम है कि आखिर यह कैसे हुआ। ऐसी भोली सूरत के पीछे दोहरे चरित्र वाले नेता को पार्टी ने प्रत्याशी बना दिया है।

क्या शाह लेंगे इनके दोहरे चरित्र का संज्ञान

अहम पदों पर रहकर भी इस लाल के बिकाऊ चरित्र के साथ ही भाजपा का दोहरा चरित्र भी सबके सामने है
कुछ समय पहले इनके जिलाध्यक्ष ने भी बालको के खिलाफ चरणबद्ध आंदोलन का ऐलान किया था। कहा था कि बालको के खिलाफ जमकर प्रदर्शन करेंगे। ज्ञापन सौंपा बिंदुवार मुद्दे उठाए, मंत्री रहते जयसिंह अग्रवाल ने बालको को घेरा दौरा किया। बालको की पोल खोली अधिकारियों को जांच के आदेश भी दिए। लेकिन जिलाध्यक्ष ने अपना आंदोलन वापस ले लिया। तब भी हमारे कोरबा के लाल उनके साथ कदमताल कर रहे थे। आखिर कौन सी मजबूरी थी, जिसकी वजह से उन्होंने आंदोलन वापस ले लिया, यह सब जनता देख रही है। सवाल पूछ रही है। इसे लेकर क्षेत्र की जनता में कई चर्चाएं हैं। युवाओं में आक्रोश है। बेरोजगारी का मुद्दा हो या संगठन का नेतृत्व। हर मोर्चे पर पार्टी और उसके सिपहसालार फेल रहे है। सवाल यह है कि क्या अब  शाह के कोरबा आने के बाद इन सभी मामलों का संज्ञान लेंगे। क्या वह मरे हुए संगठन को आड़े हाथ लेंगे, देखना दिलचस्प होगा।


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