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नारी शक्ति: बिजली उत्पादन में योगदान के साथ जैविक खेती कर प्रेरक मिसाल बन रही CSEB की इंजीनियर प्रतिमा

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छत्तीसगढ़ कालेज (दुर्ग-भिलाई) में बीएससी अंतिम वर्ष कृषि की छात्रा आकांक्षा बेन ने अपने परियोजना कार्य अंतर्गत ढूंढ निकाली यह प्रेरक कहानी,  कीटनाशकों के स्थान पर गोबर खाद, पोल्ट्री अपशिष्ट तथा पोल्ट्री फीड वेस्ट का उपयोग कर रसायन मुक्त फसल उत्पादन कर रहीं विद्युत कर्मी प्रतिमा रॉय। एनटीपीसी टाउनशिप में निवासरत प्रतिमा एनटीपीसी में कार्यरत प्रहलाद राय की धर्मपत्नी हैं। सरकारी नौकरी की व्यस्तताओं के बावजूद उनका उत्कृष्ट प्रबंधन, अनुशासन और खेती के प्रति समर्पण सराहनीय है। उनकी उपलब्धि यह दर्शाती है कि महिलाएं आज केवल परिवार और नौकरी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कृषि नवाचार और ग्रामीण विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

कोरबा। सरकारी नौकरी के साथ सफ़लतापूर्वक खेती भी, यह तो सचमुच कमाल है। दोनों का सफल तालमेल बिठाकर महिला विद्युत विभाग में इंजीनियर प्रतिमा अपनी नौकरी के साथ जैविक और प्राकृतिक खेती कर अपनी आय बढ़ाने और पर्यावरण को संरक्षित करने का बेहतरीन उदाहरण पेश कर रही हैं।

ऊर्जा नगरी कोरबा की इस प्रेरक कहानी को छत्तीसगढ़ कालेज (दुर्ग-भिलाई) बीएससी कृषि अंतिम वर्ष की छात्रा आकांक्षा बेन ने अपने परियोजना कार्य अंतर्गत ढूंढ ने ढूंढ निकाला, जो एकीकृत एवं प्राकृतिक खेती की सफलता की प्रेरणादायक मिसाल प्रस्तुत करता है।

सरकारी नौकरी और खेती—दोनों जिम्मेदारियों को एक साथ सफलतापूर्वक निभाना आसान नहीं होता। लेकिन सीएसईबी, कोरबा की एक महिला कर्मचारी प्रतिमा रॉय ने अपने दृढ़ संकल्प, मेहनत और नवाचारी सोच से यह साबित कर दिया है कि यदि इच्छाशक्ति मजबूत हो तो हर चुनौती को अवसर में बदला जा सकता है।

धान, मक्का, सब्जियां व फलदार फसलों का उत्पादन

प्रतिमा ने अपनी 1.12 एकड़ कृषि भूमि पर एकीकृत एवं प्राकृतिक खेती मॉडल विकसित कर ग्रामीण क्षेत्र में एक प्रेरणादायक उदाहरण प्रस्तुत किया है। उनके खेत में धान, मक्का, विभिन्न प्रकार की सब्जियां तथा फलदार फसलों का उत्पादन पूरी तरह प्राकृतिक पद्धति से किया जाता है। रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के स्थान पर वे गोबर खाद, पोल्ट्री अपशिष्ट तथा पोल्ट्री फीड वेस्ट का उपयोग जैविक खाद के रूप में करती हैं। इससे मिट्टी की उर्वरता और गुणवत्ता में सुधार हो रहा है, साथ ही उपभोक्ताओं को सुरक्षित एवं रसायनमुक्त खाद्य सामग्री उपलब्ध हो रही है।

लगभग 60 डिसमिल भूमि में की गई धान की खेती से इस वर्ष करीब 10 क्विंटल उत्पादन प्राप्त हुआ है, जो प्राकृतिक खेती की सफलता को दर्शाता है। इसके साथ ही उनके फार्म में मत्स्य पालन और 100 से अधिक पक्षियों वाला पोल्ट्री यूनिट भी संचालित हो रहा है। फसल उत्पादन, मछली पालन और पोल्ट्री को एक-दूसरे से जोड़कर उन्होंने ऐसा एकीकृत कृषि मॉडल विकसित किया है, जिससे संसाधनों का बेहतर उपयोग हो रहा है और आय के अनेक स्रोत सृजित हुए हैं।

महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत

प्रतिमा की सफलता ग्रामीण युवाओं, किसानों और विशेष रूप से महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। यह उदाहरण बताता है कि प्राकृतिक एवं एकीकृत खेती न केवल पर्यावरण संरक्षण में सहायक है, बल्कि कम लागत में अधिक लाभ देने वाला एक टिकाऊ कृषि मॉडल भी है।

उनकी यह यात्रा इस बात का सशक्त प्रमाण है कि मेहनत, दूरदृष्टि, नवाचार और सही योजना के साथ खेती को लाभकारी, आत्मनिर्भर और पर्यावरण-अनुकूल बनाया जा सकता है। आज वे न केवल एक सफल कर्मचारी हैं, बल्कि एक प्रगतिशील कृषक के रूप में भी समाज के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं।

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